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आखिर निजीकरण क्यों ??

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निजीकरण पर अधिक जानकारी लोगो को बेहतर सुविधाएं देने के लिए कुछ सेवाओं का निजीकरण करने की आवश्यकता है। क्योंकि कुछ सेवाओं का संचालन करने के लिए देश की अन्य सेवाओं के बजट में कटौती करनी पड़ रही है। यह तर्क है मोदी सरकार का निजीकरण के पक्ष में। निजीकरण क्या है ??? निजीकरण से आशय है कि जब कोई सरकारी क्षेत्र की सेवा या उद्योग का संचालन या रखरखाव पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से निजी हाथों के सौंप दिया जाए। क्या आम लोगों को निजीकरण से फायदा होगा ??? इसे ऐसे समझे कि आप एक मध्यम वर्ग से है और खाना खाने गए। आप खाना ऐसे होटल में खाओगे जहाँ एयर कंडिशन लगे हो। एक प्रकार से पाँच सितारा होटल जहाँ पर बैठकर खाना खाना ही वहाँ के भोजन से ज्यादा महँगा हो। शायद आप ऐसी जगह नही जाओग, आपको चाहिए अच्छा खाना चाहे वो नॉर्मल होटल ही क्यों ना हो। क्योंकि हमें भूख मिटानी है वह एक साफ सुधरे छोटे होटल में भी मिट सकती है। ये ऊँचे पाँच सितारा होटल तो उनके काम के जो पहले से पूंजीपति है। गरीब किसान बेचारा करोना काल मे मास्क की जगह अपने साफा(गमछा) से मुँह को ढकने वाला भला ऐसी हरकत करेगा ?? कभी नही करेगा। ऐसा ही नि...

पत्रकारिता धर्म की आड़ में मालामाल

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 कल राहुल गाँधी ने एक ट्वीट किया कि " बीजेपी और संघ भारत मे फेसबुक और वाट्सप पर नियंत्रण करती है जिसके माध्यम से ये अपना ही प्रचार करवाते हैं।" राहुल गांधी के इस वक्तव्य के पीछे हम नही जाते।  बात करेंगे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की जो आज लड़खड़ा ही रह अपितु इन पार्टियों की गुलामी करते करते विकृत हो कर धराशायी भी हो चुका है। पूरी दुनिया मे करोना के नाम पर डराया जा रहा है। क्या करोना से ज्यादा मास्क और सरकार की पाबन्दियों से लोग ज्यादा मर रहे हैं। ये तो हुए मीडिया के लिए बहस के विषय परन्तु आज तक वाले हल्ला बोल कार्यक्रम में राहुल गाँधी के इस ट्वीट के पीछे पड़ गए। इस ट्वीट का रायता बना कर पूरे देश मे फैला कर ही दम लेंगे। अब इन पार्टियों को भी पता लग चुका है कि देश को मुद्दों से कैसे भटकाना है।  जब तक देश का मीडिया सत्ता पक्ष की चाटूकारिता करेगा तब तक फेसबुक और व्हाट्सएप्प जिसे महान और पसन्दीदा बनाने की कोशिश कर रहे हैं वो कोशिश कामयाब होती रहेगी।

जर्दे की ताली

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कल भारत 74 वां स्वतंत्रता दिवस बनाने जा रहा है। हर भारत वासी के लिए ये दिन बहुत गौरान्वित करने वाला है। किंतु एक बात समझ नही आती की हमारी राष्ट्रभक्ति स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस इन दो दिवसों में ही सिमट कर रह गयी है। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। यही सब कुछ यत्र तत्र देखने को  मिल रहा है। चलो आज राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने जाते हैं। भाई हमें सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी नही करनी चाहिए। नरेगा जैसी विशाल योजना में सरपंच और मेट जो भृष्टाचार करके देश को खोखला कर रहे हैं, हमें उसका विरोध करना चाहिए। पड़ोस के अंकल जी आदमी तो ईमानदार है पर इस बात पर बोले.. हमें क्या करना है.. सरकार का पैसा है। कोई खा रहा है तो खाने दो। ये सरकार का क्या है ? समझ नही आया। जब देश के करोड़ों राष्ट्रभक्तो के टेक्स का पैसा इन चोरों की जेब मे जा रहा है और इतने देशभक्त होते हुए भी इन राष्ट सम्पति के चोरों पर कोई लगाम क्यों नही लगता ??? ये विचार हमारे मष्तिष्क में भी आया पर आज सुबह एक घटना सुनी जो आपको भी बताते है... किसी आंदोलन की तैयारी के लिए मीटिंग हो रही थी। एक वक्ता अपनी बात रखने के लिए खड़े होकर बोल रह...

राम राज्य कब आएगा ????

मन्दिर बनाना या मंदिर में जाना अपनी एक आस्था हो सकती है परन्तु मानवता का जन्म किसी पूर्ण सन्त जो हमें शास्त्र समत साधना के लिए प्रेरित करें, से ही सम्भव है। आज के इस आर्थिक युग में जब हर कोई पैसे की दौड़ में लगा हुआ है।हमें समझना चाहिए की मंदिरो की भारत मे कोई कमी नही है, कमी है तो सच्चे शास्त्र आधारित ज्ञान की जिसे आप इस वेबसाइट पर जाकर प्राप्त कर सकते हैं।  https://www.jagatgururampalji.org/hi/

अधूरा मोदी सपना

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आज मोदी जी भूमि पूजन के लिए आयोध्या गए। वहाँ उन्होंने सोशल डिस्टेंस का बहुत ध्यान रखा और सन्देश भी दिया कि कोरोना से सावधानी बहुत जरूरी है,  परन्तु कुछ अंधभक्त जिन्हें केवल दिखावा ही करना है। गाँव गाँव (उनके लिए नही जिन्होंने मोदी जी की तरह कोरोना गाइड लाइन का पालन किया) राम मंदिर का ढोल पीटने के बहाने कुछ समय पहले जमातियों द्वारा पोषित परम्परा का बखूबी निर्वहन किया। बात जब स्वयं की आती है हम इतने लापरवाह कैसे हो जाते हो। सुनो अब पुलिस और कानून के रक्षक भी चुप है क्योंकि किस किस को रोके, भई ज्यादा रोक भी नही सकते, उनको पाकिस्तान थोड़ी जाना है।

कसम संविधान की

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अगर आज हम अपने स्वार्थवश संविधान को ताक पर रखेंगे तो निश्चित ही हम एक ऐसी ही परम्परा की शुरुआत करके जा रहे है। इस परम्परा का दुरुपयोग ही होगा क्योंकि सरकारें आएगी, जाएगी....😢  सत्ता का यह खेल तो लोकतंत्र में चलता ही रहेगा, परन्तु संविधान की नजरअंदाजगी पोषित कर रही है  ऐसी ही परम्पराओ को जिन्हें हमें समझना होगा।