जर्दे की ताली
कल भारत 74 वां स्वतंत्रता दिवस बनाने जा रहा है। हर भारत वासी के लिए ये दिन बहुत गौरान्वित करने वाला है। किंतु एक बात समझ नही आती की हमारी राष्ट्रभक्ति स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस इन दो दिवसों में ही सिमट कर रह गयी है। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। यही सब कुछ यत्र तत्र देखने को मिल रहा है। चलो आज राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने जाते हैं। भाई हमें सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी नही करनी चाहिए। नरेगा जैसी विशाल योजना में सरपंच और मेट जो भृष्टाचार करके देश को खोखला कर रहे हैं, हमें उसका विरोध करना चाहिए। पड़ोस के अंकल जी आदमी तो ईमानदार है पर इस बात पर बोले.. हमें क्या करना है.. सरकार का पैसा है। कोई खा रहा है तो खाने दो। ये सरकार का क्या है ? समझ नही आया। जब देश के करोड़ों राष्ट्रभक्तो के टेक्स का पैसा इन चोरों की जेब मे जा रहा है और इतने देशभक्त होते हुए भी इन राष्ट सम्पति के चोरों पर कोई लगाम क्यों नही लगता ???
ये विचार हमारे मष्तिष्क में भी आया पर आज सुबह एक घटना सुनी जो आपको भी बताते है...
किसी आंदोलन की तैयारी के लिए मीटिंग हो रही थी। एक वक्ता अपनी बात रखने के लिए खड़े होकर बोल रहे थे। बाकी लोग बैठे हुए थे। बैठे हुए आंदोलकारियों में एक आंदोलनकारी जर्दा निकलता है। उसे मसलता है। हथेली में रख कर ऊपर दूसरी हथेली मारता है। (जर्दा तैयार करने की पद्धति) जिसे ताली की आवाज निकलती है। बस फिर क्या था। बैठे हुए महानुभावों ने सोचा ताली बजानी होगी। और सब ने ताली ठोक दी। वक्ता ने सोचा ताली बजाने का वक्त तो अभी आया ही नही था, शायद आंदोलनकारी ज्यादा ही जोश में है। अब आंदोलन सफल हो कर ही रहेगा। ये हालात हो गयी है राष्ट्रभक्ति की स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर....
Nice
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंआज यही हालत हो चुकी है
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